यूजीसी के नए नियमों पर संघ ने उठाए सवाल, सुनील आम्बेकर बोले- व्यवस्था में संतुलन जरूरी
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए समानता नियमों को लेकर जारी विवाद के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। संघ ने इन नियमों को असंतुलित बताते हुए कहा है कि आगे जो भी फैसला लिया जाए, उसमें सभी पक्षों की चिंताओं का ध्यान रखा जाना चाहिए।
संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर ने 31 अक्टूबर को इंदौर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान यह बात कही। उनसे यूजीसी के नए नियमों और उन पर उठ रहे सवालों के बारे में पूछा गया था। आम्बेकर ने कहा कि संघ पहले ही इन नियमों को लेकर अपनी चिंता संबंधित अधिकारियों तक पहुंचा चुका है। सरकार और यूजीसी ने भी इस पर ध्यान दिया है।
उन्होंने कहा कि भविष्य में इस मामले पर जो भी निर्णय हो, वह संतुलित होना चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी पक्ष की चिंताओं को नजरअंदाज न किया जाए।
क्या हैं यूजीसी के नए नियम?
यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और भेदभाव रोकने के लिए नए नियम अधिसूचित किए थे। इनका नाम ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026’ है।
इन नियमों का उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म स्थान और दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना है। इसके तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता समितियां बनाने और शिकायतों पर कार्रवाई की व्यवस्था की गई है।
नियमों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के प्रतिनिधियों को समानता समितियों में शामिल करने का प्रावधान भी है।
सामान्य वर्ग के संगठनों ने क्यों जताई थी आपत्ति?
नए नियम लागू होने के बाद सामान्य वर्ग के कई संगठनों और छात्रों ने इन पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा मुख्य रूप से SC, ST और OBC समुदायों के सदस्यों के संदर्भ में दी गई है। इससे सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव की स्थिति में समान संरक्षण मिलने को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।
इसके अलावा, नियमों में झूठी शिकायत दर्ज कराने वालों के खिलाफ कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान नहीं होने पर भी आपत्ति जताई गई। विरोध करने वाले संगठनों को आशंका है कि इन नियमों का गलत इस्तेमाल हो सकता है।
दूसरी ओर, इन नियमों का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था जरूरी है। उनका मानना है कि शिकायतों की जांच और कार्रवाई की प्रभावी व्यवस्था से पीड़ित विद्यार्थियों को न्याय मिल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने नियमों पर लगा रखी है रोक
यूजीसी के नए नियमों को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 29 जनवरी 2026 को शीर्ष अदालत ने इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी थी। अदालत ने कहा था कि नियमों के कुछ प्रावधानों में अस्पष्टता है और इनके गलत इस्तेमाल की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने विशेष रूप से जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा और सामान्य वर्ग के लोगों को मिलने वाले संरक्षण से जुड़े सवालों पर विचार करने की जरूरत बताई थी। अंतरिम व्यवस्था के तहत 2012 के पुराने नियमों को लागू रखने का निर्देश दिया गया।
इसका अर्थ है कि 2026 के नए नियमों को फिलहाल लागू नहीं किया जा रहा है। मामले में अंतिम फैसला आना अभी बाकी है।
सरकार के सामने सभी पक्षों को साथ रखने की चुनौती
इस विवाद में सरकार के सामने दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। पहली, उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था तैयार करना। दूसरी, यह सुनिश्चित करना कि नियमों का इस्तेमाल किसी निर्दोष विद्यार्थी या शिक्षक को परेशान करने के लिए न हो।
आरएसएस ने भी अपने बयान में सामाजिक एकता बनाए रखने पर जोर दिया है। सुनील आम्बेकर ने कहा कि किसी एक सरकारी सर्कुलर के कारण समाज की एकता प्रभावित नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक, समाज को मजबूत बनाए रखने के लिए सभी पक्षों के बीच सहमति और संतुलन जरूरी है।
अब आगे क्या होगा?
यूजीसी के नियमों पर अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर निर्भर करेगी। सरकार को नियमों के उद्देश्य और उन पर उठाई गई आपत्तियों के बीच संतुलन बनाना होगा।
फिलहाल आरएसएस के बयान ने इस विवाद को फिर चर्चा में ला दिया है। अब देखना होगा कि सरकार और यूजीसी नियमों में बदलाव करते हैं या अदालत के सामने अपना पक्ष रखकर आगे की प्रक्रिया पूरी करते हैं।











