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यूपी चुनाव से पहले UGC विवाद पर केंद्र का यू-टर्न? सुप्रीम कोर्ट में कमेटी बनाने का संकेत, BJP के सामने जातीय समीकरण की चुनौती

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए इक्विटी नियमों का विवाद एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों की नाराजगी के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि वह इन नियमों की समीक्षा के लिए एक कमेटी गठित करने पर विचार कर रही है।

सरकार का यह रुख ऐसे समय आया है, जब उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल बनने लगा है और UGC नियमों को लेकर बीजेपी के भीतर भी असहजता की खबरें सामने आ रही हैं। हालांकि, सरकार ने अभी नियमों को वापस लेने का कोई अंतिम फैसला नहीं किया है। इसलिए इसे फिलहाल पूर्ण यू-टर्न के बजाय पुनर्विचार की पहल कहना ज्यादा सही होगा।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने क्या कहा?

5 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में UGC के 2026 के इक्विटी नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार एक कमेटी बनाने पर विचार कर रही है, जो नियमों की समीक्षा कर सकती है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने भी सुझाव दिया कि नियमों पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी वर्ग के छात्र को असुरक्षा या भेदभाव की आशंका न रहे।

अदालत ने सभी छात्रों के हितों की सुरक्षा पर जोर दिया। इसके बाद मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी गई। महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र ने अभी कमेटी गठन की औपचारिक घोषणा या नियमों की वापसी का आदेश नहीं दिया है।

आखिर UGC के नए नियमों पर विवाद क्यों हुआ?

UGC ने जनवरी 2026 में उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और भेदभाव रोकने के उद्देश्य से नए नियम लागू किए थे। विवाद मुख्य रूप से नियमों के उस प्रावधान को लेकर हुआ, जिसमें जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा के तहत अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के सदस्यों का उल्लेख किया गया।

सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों ने सवाल उठाया कि अगर उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता है तो उन्हें इस विशेष प्रावधान के तहत शिकायत का समान संरक्षण क्यों नहीं मिलेगा?

विरोध करने वालों को आशंका थी कि नियमों का दुरुपयोग हो सकता है और इससे विश्वविद्यालयों में जातिगत तनाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकना और वंचित समुदायों के लिए शिकायत निवारण व्यवस्था मजबूत करना बताया गया था।

29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी थी। अदालत ने शुरुआती तौर पर नियमों की भाषा को अस्पष्ट बताते हुए इनके व्यापक और गंभीर प्रभाव की आशंका जताई थी।

BJP के लिए यूपी में क्यों बढ़ी राजनीतिक चिंता?

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के सामने जातीय समीकरण साधने की चुनौती है। पार्टी को सामान्य वर्ग के साथ-साथ OBC और SC समुदायों का भी राजनीतिक समर्थन बनाए रखना है।

UGC विवाद ने पार्टी के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ सामान्य वर्ग के कुछ संगठनों और छात्रों में नाराजगी देखने को मिली, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक न्याय और पिछड़े-दलित वर्गों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं।

इस विवाद के दौरान उत्तर प्रदेश में बीजेपी के कुछ पदाधिकारियों के इस्तीफे की खबरें भी सामने आई थीं। इससे पार्टी संगठन के भीतर असहजता का संकेत मिला।

प्रयागराज में 1 नवंबर को UGC नियमों को लेकर सवाल पूछने वाले एक व्यक्ति के साथ बीजेपी पार्षद की कथित मारपीट का मामला भी सामने आया। इसके बाद स्थानीय विधायक हर्षवर्धन बाजपेयी ने सोशल मीडिया पर कहा कि UGC नियमों पर सवाल उठाना हर व्यक्ति का अधिकार है।