पीलीभीत में वोटर लिस्ट से छेड़छाड़ पर चुनाव आयोग सख्त, दो SDM निलंबित; FIR में जोड़ी गई नई धारा

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उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी के मामले में चुनाव आयोग ने सख्त कदम उठाया है। आयोग ने तत्कालीन एसडीएम और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) मयंक गोस्वामी और हेमंत चौधरी को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही दोनों अधिकारियों और कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार के खिलाफ दर्ज एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 198 जोड़ने को कहा गया है।

चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा को भेजे पत्र में यह भी साफ किया है कि दोनों अधिकारियों को आयोग की अनुमति के बिना दोबारा बहाल नहीं किया जा सकेगा। इस कार्रवाई के बाद पीलीभीत के मतदाता सूची मामले में प्रशासनिक और कानूनी जांच तेज हो गई है।

10,470 मतदाता प्रविष्टियों में मिली अनियमितता

यह पूरा मामला पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र संख्या 127 की मतदाता सूची से जुड़ा है। जांच में सामने आया कि मतदाता पंजीकरण केंद्र में तैनात एक कंप्यूटर सहायक ने कथित तौर पर ECINET पोर्टल पर अपनी लॉगिन आईडी का गलत इस्तेमाल किया।

जांच के अनुसार, 31 मई से 29 अगस्त 2026 के बीच मतदाताओं की जानकारी में बदलाव करने के लिए फॉर्म-8 के कुल 13,779 आवेदन दर्ज किए गए थे।

इनमें से 10,470 आवेदन स्वीकार कर लिए गए, जबकि 3,309 आवेदन खारिज कर दिए गए। सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि इन आवेदनों से जुड़े जरूरी कागजात और मूल फॉर्म संबंधित कार्यालय में नहीं मिले।

इसके बाद मतदाता सूची में हुए बदलावों की जांच शुरू की गई। मामले में अधिकारियों और कंप्यूटर ऑपरेटर के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई गई।

कौन हैं निलंबित किए गए दोनों अधिकारी?

चुनाव आयोग की कार्रवाई में पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र के तत्कालीन निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी मयंक गोस्वामी और हेमंत चौधरी शामिल हैं। दोनों एसडीएम स्तर के अधिकारी हैं।

इनके खिलाफ पहले ही मामला दर्ज कराया जा चुका है। अब आयोग ने निलंबन के साथ विभागीय कार्रवाई को भी आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।

आयोग ने कहा है कि दोनों अधिकारियों के आरोपपत्र की जांच की जाएगी। इसके लिए आरोपपत्र आयोग को भेजना होगा। बिना आयोग की पूर्व अनुमति के दोनों अधिकारियों को बहाल नहीं किया जा सकेगा।

FIR में क्यों जोड़ी गई BNS की धारा 198?

इस मामले में चुनाव आयोग ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 198 जोड़ने का निर्देश दिया है।

यह धारा तब लागू होती है, जब कोई सरकारी कर्मचारी जानबूझकर कानून के निर्देश का उल्लंघन करता है और उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाना होता है।

इस धारा के तहत दोष साबित होने पर एक साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।

इस मामले में धारा जोड़ने का निर्देश दिया गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संबंधित अधिकारी दोषी साबित हो चुके हैं। इसका फैसला जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद होगा।

पीलीभीत की चारों विधानसभा सीटों की वोटर लिस्ट दोबारा जांची जाएगी

चुनाव आयोग ने केवल दो अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तक मामला सीमित नहीं रखा है। आयोग ने पीलीभीत जिले की चारों विधानसभा सीटों की मतदाता सूचियों की दोबारा जांच कराने का निर्देश दिया है।

जिला निर्वाचन अधिकारी को एक सप्ताह के भीतर जांच रिपोर्ट सौंपनी होगी। इसके अलावा मामले में शामिल कंप्यूटर ऑपरेटर और पांच सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (AERO) की भूमिका की रिपोर्ट भी मांगी गई है।

आयोग ने प्रदेश के सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों की मतदाता सूचियों की जांच करने को कहा है। खासतौर पर फॉर्म-6, फॉर्म-7 और फॉर्म-8 के जरिए जोड़े गए, हटाए गए और संशोधित किए गए नामों की जांच होगी।

कंप्यूटर ऑपरेटरों की लॉगिन आईडी भी बंद करने के निर्देश

पीलीभीत में सामने आई गड़बड़ी के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने प्रदेशभर में मतदाता पंजीकरण केंद्रों पर तैनात कंप्यूटर सहायकों की ECINET पोर्टल लॉगिन आईडी निष्क्रिय करने के निर्देश दिए हैं।

अब मतदाता सूची में बदलाव से जुड़े आवेदनों को दर्ज करने की प्रक्रिया पर अधिक निगरानी रखी जाएगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति की लॉगिन आईडी का गलत इस्तेमाल न हो।

मतदाता सूची की शुद्धता पर चुनाव आयोग का जोर

पीलीभीत का मामला सामने आने के बाद मतदाता सूची की विश्वसनीयता और उसकी जांच प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आयोग ने साफ किया है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या संशोधन करने में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

अब इस मामले में आगे की जांच के साथ यह भी देखा जाएगा कि 10,470 स्वीकृत आवेदनों में किन लोगों के नाम और विवरण बदले गए और इन बदलावों के लिए जरूरी दस्तावेज क्यों उपलब्ध नहीं थे।

फिलहाल दो अधिकारियों के निलंबन, एफआईआर में नई धारा जोड़ने और पूरे जिले की मतदाता सूची की दोबारा जांच के आदेश के बाद पीलीभीत का मामला उत्तर प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है।